कहाँ से चले , कहाँ आये हम?

इन सालों में कितनों को अलविदा कह दिया बिन चाहे,
कितने पथिको की खो गयी राहें ,
कितनों की आँखें नम हैं , सुनसान सी ,
जैसे रह न गयी हो उनमें कोई जान  सी. 
कितने ढाहे हैं एक अनदेखे अनजाने ने ऐसे सितम ,
कहाँ से चले और कहाँ आगये हम।  

बचपन में खूब फिल्मों में दिखाया ,
की हर मुसीबत में एक ऊपरी शक्ति ने ही बचाया ,
पर इतना उस भगवान् और हर अल्लाह को पुकारने पर भी,
वह आज तक नहीं आया।  
बड़ा लम्बा लग रहा है ये पतझड़ का मौसम ,
ये कहाँ से चले कहाँ आ गए हम।  

सत्ता और साज़िशों की रंजिशों के बीच ,
अधर झूल में है आम इंसान,
भगवन सोने चला गया, दुनिया पे  छा रहा है शैतान,
हालातों के मारे, बेबस, खौफ भरी निगाहें मूक बयां करें अपना गम ,
ये कहाँ से चले और कहाँ आगये हम।  

जिसको बीमारी न मार सकी, उसे भूख और बेरोज़गारी  के भेड़ियों ने मार गिराया ,
न जाने इस देश में कैसा मंज़र आया ,
सब के मुँह पे ताले हैं ,
ये कैसा सन्नाटा है भाई ?
इतने उभरते देश को,
किसने नज़र लगाई ?
कोई अब इस नईया को उभार सके ,
क्या किसीमे नहीं इतना दम?
ये कहाँ से चले ,
कहाँ आये हम?
                               शैलजा सिंह

A poem on corona

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