मेरे मन की अजीबियत

कितनी अजीब बात हैं न,
कि वह जब तक था .. एक खौफ्फ़ सा रहता था मन में ,
पर अब उसके जाने के बाद उसकी कमी सी खलती है ..
शाम की तन्हाई धीरे धीरे पिघलती है…
ये नहीं है की उसके होने से कम थी तन्हाई..
पर उसके जाने से चली गयी रही सही उम्मीद की परछाई ..
की अब इन गलियों में खौफ नहीं तो ख़ुशी के फूल भी नहीं मिलते हैं..
उम्र बदलती है पर हालात नहीं बदलते हैं …

याद करते करते उम्र बिता दी
पर वह इस राह पर आया नहीं…
कोई हमें याद आहें भरे
ऐसा मंज़र वक़्त ने बनाया नहीं ..
खुदा खैर करे… की याद फरियाद न हो पाए …
की फिर रिश्ते जन्मों के हो जाते हैं…
यहाँ तो आलम है की एक जनम भी निभ जाएँ
तो हम जश्न मनाते हैं .

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