चाह नहीं किसी धनवान की पत्नी कहलाऊँ चाह नहीं किसी राजा के घर पर राज कर भाग्य पर इठलाऊँ चाह नहीं किसी की प्रेमिका बन उसके मिलन गीत गाऊँ चाह नहीं दहेज़ ले जा कर माँ बाप पर यूँ बोझ कहाऊँ मुझे पढ़ा लिखा कर मेरे बनमाली उस पथ पर चलते हुए देख आत्मनिर्भर बनने के लिए जिस पथ जाए नारी हर एक – शैलजा सिंह (माखन लाल चतुर्वेदी जी की पुष्प की अभिलाषा से प्रेरित)
I wish I could hug you stranger Or cry my heart out, held in your arms. I wont know you, you wont know me. Anonymous masks we would wear. Who are you or who am I, We wouldn’t ask , we wouldn’t care. So much that this heart wants to say, Unknown emotions, feelings at play. I wish I could gaze deep into your eyes, Pools of compassion that they are. Perhaps some where in those bright orbs. I would find my north star. I wish I could whisper in your ear The incessant longings and yearnings of my dark night May be that would heal my soul, May be that would be my respite. May be as we unload our burdens And go our separate ways… May be our nights would become calmer And brighter would be our days… – Shailaza singh
Sometimes you find strangers are better to help you let go..
Some old clothes are not to throw away, Some old clothes you should try again one day. To see how much you’ve changed. Some old clothes when you wear again To see the weight loss or gain Some old clothes you wear to remember who you are No matter how cloudy the night, you are still what you once were- a beautiful star. People say you shouldn’t dwell in the past, ‘Cause the days never last. Yes tis’ true that you should keep moving ahead because life is always about the new, But some old clothes help you in making friends with the old ‘you’ Not that you shouldn’t throw away the old.. But some old clothes that show you who you really are or how far you’ve come are just pure gold. – Shailaza Singh
पुनर जन्म सा कुछ पाते हैं , जब माँ बाप बन जाते हैं
काम उपदेशों से नहीं चलता है सैलाब सख्ती से नहीं थमता है कुछ नहीं बदलता जब तक हम नहीं बदल जाते हैं पुनर जन्म सा कुछ पाते हैं , जब माँ बाप बन जाते हैं
कुछ नया हो जब उनसे कराना चलता नहीं कोई पैंतरा पुराना जब तक खुद नहीं कर दिखाते हैं उनको कहे शब्द नहीं समझ आते हैं पुनर जन्म सा कुछ पाते हैं , जब माँ बाप बन जाते हैं
बीते लड़कपन की हरकतें अब उनके आईना में जब नज़र आती हैं खुद में खामियां भी नज़र आती हैं मिसाल कायम करने के लिए खुद सुधर जाते हैं पुनर जन्म सा कुछ पाते हैं , जब माँ बाप बन जाते हैं
हमारे हर कदम, हर सांस पर उनकी नज़र बरक़रार है ये कुर्बानी तो नहीं पर एक अनूठा प्यार है हीरे को तराशते हुए खुद कुंदन बन जाते हैं पुनर जन्म सा कुछ पाते हैं , जब माँ बाप बन जाते हैं. – शैलजा सिंह
तुम और मैं बात करते हैं.. तो दिल हल्का हो जाता है साथ चलते हैं कुछ पल पर न जाने क्या ये नाता है
सुकून भरी बातें, पर उनका कोई काम नहीं , आवाज़ का रिश्ता जिसकी कोई पहचान नहीं कौन हो तुम, क्या करते हो.. क्या पता क्यों इस राह से रोज़ गुज़रते हो पर तुमसे यु गुफ्तगू कर दिल को करार आता है तुम और मैं बात करते हैं.. तो दिल हल्का हो जाता है
हम भी तेरी आवाज़ का इंतज़ार करते हैं तेरे आने की उम्मीद में रोज़ सवरते हैं पर मौसम रोज़ बदलते हैं ये दिल हमको याद दिलाता है पर फिर भी तुम और मैं बात करते हैं.. तो दिल हल्का हो जाता है
क्यों सोचना इतना की दिमाग ख़राब हो जाये, क्यों ढूंढना इतना की हम खुद ही खो जाएं . कश्ती को भॅवर में जाने से पहले मोड़ दो, कुछ बातें वक़्त पर छोड़ दो.
आने वाले पल की पंखुड़ी, धीरे धीरे आँख खोलेगी . जो होना है . तुमको इशारों में बोलेगी, इतने बेचैन मत बनो की मिटटी के पकने से पहले, तुम कच्चे घड़े को फोड़ दो. कुछ बातें वक़्त पर छोड़ दो.
जिनको मिलना होता है, उनको रोक नहीं पता ज़माना, और जहाँ मिलन नहीं, वहां बनता नहीं फ़साना तुम अभी कसके पकड़ो अरमानो की डोर को कुछ बातें वक़्त पर छोड़ दो.
उसको भी उड़ने दो, तुम भी भरो उड़ान , दोनों की हो अपनी पहचान .. साथ चलो एक नयी चेतना जगाओ , वह तुम्हारी बने , तुम उसकी प्रेरणा बन जाओ पंख फैलाओ और मत मानो गगन के छोर को . कुछ बातें वक़्त पर छोड़ दो – शैलजा
तेरे आने की बड़ी तैयारियां की हमने पलके बिछायीं और सपने भी सजाये , बड़ा इंतज़ार किया की तू अब आये.. कुछ नए सूट भी सिलवाए की तुझे पहनाएंगे की अपने दिलबर को हम खुद ही सजायेंगे .. पर जब थक गयी आँखें तेरा रास्ता निहारते जब सूख गया गला तुझे पुकारते तो खुद ही पहन के हमारे अपने दिलबर का लिबास … हम ही बन गए खुद अपने ही ख़ास की तुझसे उम्मीद छोड़ खुद से इश्क़ लड़ाया , तेरे न आने का शुक्रिया… क्योंकि अब हम ने खुद में ही अपना खोया प्यार पाया..
You are your best friend…you are your only love….start a love affair with your own self…you won’t need anyone else..
इस जंगल जैसे शहर में, भीड़ और कोतुहल के किनारे, वह दिखा मुझे सफ़ेद सा, चेहरे पर उसके मंद सी मुस्कान थी, हथेली में समां जाए , इतनी नन्ही सी जान थी .
निहारती रही मैं उसको, पर नाम न दे पायी . वह थोड़ा चलने लगा, मैं भी उसके पीछे चल पड़ी, कुछ सुझा नहीं उसके अलावा , उस पल , उस घड़ी .
यु लगा उसमे ताक़त असीम है , फुर्ती से बढ़ जायेगा , शायद हम दोनों को एक दूजे से सुकून मिल पायेगा . पर न जाने क्यों , वक़्त को ये मंज़ूर नहीं था या शायद हालात ने किया शिकार , की जाने अनजाने घातक हुआ दिल पे वार.
वह मंज़र, वह पल हवा के साथ गायब हो गया . अब तक समझ नहीं पायी क्या हुआ , पर कुछ तो था और वह खो गया .
उम्मीद उम्र देखती तो सुकून की ज़िन्दगी जी पाते, कोई इधर न भटकता और हम भी उस मोड़ पर न जाते.
न सपने देखते न उस दरवाज़े पर लगाते टकटकी, न चलती कोई नज़्म ज़हन में, न आती किसी को मौसिकी, अजनबी ख्वाइशों के सैलाबों में हम न डूब पाते.
उम्मीद उम्र देखती तो सुकून की ज़िन्दगी जी पाते, कोई इधर न भटकता और हम भी उस मोड़ पर न जाते.
आहटों को कह देते की कोई घर में नहीं रहता, रोज़ दर पर ना खेलें , बंद करलेते आरज़ू की आखें. ताकते नहीं यूँ रंगों के मेले, तेरे मिलने की खुद ही खुदा को ऐसी गुहार न लगाते.
उम्मीद उम्र देखती तो सुकून की ज़िन्दगी जी पाते, कोई इधर न भटकता और हम भी उस मोड़ पर न जाते.
रातों में मेहखानों में न लगती दिलजलों की महफ़िलें, न बनते दीवाने, न भूलती मंज़िलें, मेह की आगोश में, यु बेवजह राही नहीं सो जाते,
उम्मीद उम्र देखती तो सुकून की ज़िन्दगी जी पाते, कोई इधर न भटकता और हम भी उस मोड़ पर न जाते.
कमर सहारा मांगे, पाँव मुड़ना नहीं चाहते, हाथों को हिलना नहीं है, दिमागी जुड़ना नहीं चाहते. बुद्धि चलती नहीं, वही पुराना राग सुनाती है, करवटों के बिस्तर में, रातों को नींद नहीं आती है, कुछ घुटने अकड़ रहे हैं, जकड़े हुए लगते हैं सारे खयालात , वही बातें होती हैं , चाहे कोई भी करे बात, क्या दौर आया है, सुनना किसी को गवारा नहीं, इन दिनों सब रोती हुई शादी में हैं, कोई खुश कवरा नहीं, कहने को पेड़ हैं , पर सांस नहीं आती, ये क्या कश्मकश हैं जो समझ नहीं आती.
मुझसे मिली मैं तो एहसास ये हुआ … की औरों को तो बड़े प्यार से निहारा पर खुद को मोहब्बत से न छुआ . मुझसे मिली मैं तो यह हुआ यकीन की हैं तो बहुत इस दुनिया में पर मैं भी कम हसीन नहीं मुझसे मिली मैं तो मैंने ये जाना खुद से मिले हुए हो गया एक ज़माना
बहुत दिनों से नींद से मुलाक़ात नहीं हुई थी , सोचा मिल ही आते हैं, काफी दिनों से नाराज़ थी… की घर आकर भी नहीं आते हैं . की और बातों से बात करते हैं. मुझसे नहीं करते गुफ्तगू .. तो आज इत्मीनान से उसके घर बैठ कर पूरी करदी उसकी यह भी आरज़ू
खुद से लड़ना इतना आसान नहीं, की पीडियों से ये आदतें चली आ रहीं हैं. ईमारत की नींव को खोद कर फिर बनाना काफी दर्द भरा एहसास हो जाता है .. शरीर भी अपनी मनमानी कितनी चलाता है.. दिमाग भी कुछकम नहीं क्योंकि दर्द उसको भी कहाँ कबूल हो पाता है..
सोचो तो लगता है आसान है मंज़िल… पर हर कदम पर लड़ना है कितना मुश्किल. जो अब तक न किया वह उम्रों के बाद करने जा रहे हैं.. जाने खुद को या दुनिया को क्या दिखा रहे हैं
बस एक ज़िद्द है जो कुछ अँधेरी राहों का उजाला हो जैसे. ज़िद्द की तलवार लिए हमने खुद पर ही कर दी चढाई, अब देखते हैं कौन जीतेगा ये अजीब सी लड़ाई…
Its not easy to fight your own heart, your own body or your own mind,
Its not easy to leave the beliefs you have grown up on behind,
Its not easy to bear pain even if it is for your own good,
It is not easy to swallow a bitter pill even though you know you should.
A stubborn will is all that you have to take on this strange fight,
To resist the comfort and to do what is painful but also right.
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